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काज़ी इल्यास रशीद साहब की याद में हुई शायरी नशिस्त, मरहूम की याद में पढ़े कलाम


यूपी बदायूं। हाफिज सिद्धीक इस्लामियां इंटर कॉलेज बदायूं से रिटायर अध्यापक एवं मशहूर उस्ताद शायर मरहूम काज़ी इल्याज़ रशीद अंजुमी साहब की याद में ताजियती शेअरी नशिस्त (काव्य गोष्ठी) का आयोजन आज़म फरशोरी की रिहाईश गाह मोहल्ला सोथा फरशोरी हाउस पर किया गया।जिसकी सदारत सीनियर शायर फिरोज़ ज़फर साहब ने की। कार्यक्रम का आगाज़ अहमद अमजदी की नात ए पाक से हुआ।


फिरोज़ ज़फर साहब ने पढ़ा-अनीस ए जां बनाना चाहता था,

तेरी कुर्बत में आना चाहता था

तू गुल था,आईना था, रोशनी था

तुझे सारा ज़मां चाहता था।


खालिद नदीम बदायूंनी ने कहा -अखलाक का परतौ थे जनाब ए इलयास,

अखलास की इक जौं थे जनाब ए इलयास।

उर्दू को अगर कहिएगा इक शम्मा नदीम,

उस शम्मा की इक लौ थे जनाब ए इलयास।।


डॉ०मुजाहिद नाज़ बदायूंनी द्वारा जामा मस्जिद शम्सी पर पहली बार नज़्म पढ़ी गई -

मस्जिदे शम्सी तेरी अजमत पे जानो दिल निसार,

है बदायूं में तू इल्तुतमिश का जिंदा शाहकार।

सर जमीनें हिन्द पर इस्लाम की एक यादगार,

बामोदर तेरे मुनव्वर तेरा दर बावकार।

देखकर हैरां है तुझको ये जहाने अर्जो तूल,

हर घड़ी रहता है तुझपर रहमते रब का नुजूल।


ई०वारिस रफी ने पढ़ा - अहले अदब का प्यार थे इलयास अंजुमी,

सब शायरों के यार थे इलयास अंजुमी।

इतवार को सजाते थे महफिल वो अपने घर,

अखलास का मिनार थे इलयास अंजूमी।


अहमद अमजदी बदायूंनी ने कहा -

जब तक न तेरी याद से आबाद रहेगा

खुश कैसे भला ये दिले नाशाद रहेगा।

ये और बात आंखों से तो हो गया ओझल,

तू याद था,तू याद है तू याद रहेगा।


सादिक अलापुरी ने कहा -

महरो वफा खुलूस का ज़ेबर किधर गया

इल्मो अदब का फिक्र का पैकर किधर गया।

नाज़ा था जिसकी ज़ात पर गुलशन का फूल फूल,

अहले चमन का दोस्तों दिलवर किधर गया।


समर बदायूंनी ने पढ़ा -

अंजुम की अंजुमन का सितारा चला गया

बज्मे अदब का यानी उजाला चला गया।

ढूंढा करेंगी अपनी निगाहें उसे समर,

बज़्मे जहां से कोई हमारा चला गया।


आज़म फरशोरी ने सुनाया -

आपसे थी अदब की शान बहुत,

सब पे रहते थे मेहरबान बहुत।

ऐसे इंसान थे हजरते इलयास,

लोग थे उनके कद्रदान बहुत।

उन्होंने ये भी पढ़ा -

सुनता था जिसकी बात मोहब्बत से आदमी,

आज़म वो सबके दोस्त थे इलयास अंजुमी

पैगामे मौत आ गया ये और बात है,

बीमारी तो नहीं थी कोई ऐसी दायमी।


शम्स मुजाहिदी ने पढ़ा -

सच है वफा शिआर थे इलयास अंजुमी

सबके गले का हार थे इलयास अंजुमी।

अहले वतन ने इज़्ज़तें बख्शीं उन्हें सदा,

उस्ताद बेमिसाल थे इलयास अंजुमी।।


इक्तेदार इमाम ने पढ़ा - ज़िंदगी जीने का अरमान बहुत करता है,

कम सफर करता है सामान बहुत करता है।


इनके अलावा सुरेंद्र नाज़,उज्ज्वल वशिष्ठ, सरवर पटियाली ने भी कलाम पेश किए।इस मौके पर इस्लामिया इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य अब्दुल सुबूर खां,आरिफ इलयास,साजिद इलयास, काज़ी रउफ,एडवोकेट बिलाल उद्दीन,सालिम फरशोरी,सै०रूमान हाशमी,सलमान अहमद उम्मी,याकूब,अम्बर हाशमी,शहाब अली शब्बू, वसीम खां,शहदा अली आदि मौजूद रहे। संचालन खालिद नदीम बदायूंनी ने किया। आज़म फरशोरी ने सभी मेहमानों का आभार व्यक्त किया।